बिन तुम्हारे मैं क्या हूँ तुम न समझोगे
आप तन्हाई की सदा हूँ तुम न समझोगे
तुम्हारे ग़मे-इश्क़ में जो चाँद पिरोता रहा
मैं साँस का वो टुकड़ा हूँ तुम न समझोगे
तुम्हारे दिल में जो हर लम्हा बहता है
मैं लहू का वही क़तरा हूँ तुम न समझोगे
तुमने जिसे बेकार समझकर फाड़ दिया
मैं उसी ख़त का टुकड़ा हूँ तुम न समझोगे
जब निगाहे-’नज़र’ बेक़रार हो चली है
मैं किस मोड़ पे आ गया हूँ तुम न समझोगे
पुराना एक ख़तो-लिफ़ाफ़ा जलाकार आया
‘विनय’ अब तुम्हारा हूँ तुम न समझोगे
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३




















Posted by विनय प्रजापति on March 26, 2008 at 3:06 PM
galib nahiin ghalib… unke naam ki qadr karo… well thanks for beautiful sh’er…
Posted by Brijmohanshrivastava on March 26, 2008 at 2:50 PM
galib woh samjhe hai na samjhenge meri bat
de un ko dil aur jo na de mujhko juban aur