तुम न समझोगे

March 13, 2008 at 11:40 am (मेरी ग़ज़ल) (, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , )

बिन तुम्हारे मैं क्या हूँ तुम न समझोगे
आप तन्हाई की सदा हूँ तुम न समझोगे

तुम्हारे ग़मे-इश्क़ में जो चाँद पिरोता रहा
मैं साँस का वो टुकड़ा हूँ तुम न समझोगे

तुम्हारे दिल में जो हर लम्हा बहता है
मैं लहू का वही क़तरा हूँ तुम न समझोगे

तुमने जिसे बेकार समझकर फाड़ दिया
मैं उसी ख़त का टुकड़ा हूँ तुम न समझोगे

जब निगाहे-’नज़र’ बेक़रार हो चली है
मैं किस मोड़ पे आ गया हूँ तुम न समझोगे

पुराना एक ख़तो-लिफ़ाफ़ा जलाकार आया
‘विनय’ अब तुम्हारा हूँ तुम न समझोगे


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

2 Comments

  1. Brijmohanshrivastava said,

    March 26, 2008 at 2:50 pm

    galib woh samjhe hai na samjhenge meri bat
    de un ko dil aur jo na de mujhko juban aur

  2. विनय प्रजापति said,

    March 26, 2008 at 3:06 pm

    galib nahiin ghalib… unke naam ki qadr karo… well thanks for beautiful sh’er…

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