आसमाँ को आज उसका हक़ पहुँचा

March 13, 2008 at 10:34 am (मेरी ग़ज़ल) (, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , )

आसमाँ को आज उसका हक़ पहुँचा
यह तीर जो मेरे दिल तक पहुँचा

ज़ख़्म देकर जो उसका जी न भरा
दिल उसका मेरे दिल तक पहुँचा

ख़ुशी की प्यास बढ़ती गयी जब
मैं भी दर्द के हासिल तक पहुँचा

धुँआ-धुँआ है आँख मेरी अब रोज़
कि मैं अपने ही साहिल तक पहुँचा

हक़= truth, righteousness


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

2 Comments

  1. Gaurav said,

    March 13, 2008 at 1:05 pm

    BAHUT BADIYA LIKHA HAI KAISE ITNA BADIYA LIKH LETE HO

  2. विनय प्रजापति said,

    March 13, 2008 at 7:58 pm

    sab ishwar ki kripa hai!

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