आसमाँ को आज उसका हक़ पहुँचा
आसमाँ को आज उसका हक़ पहुँचा
यह तीर जो मेरे दिल तक पहुँचा
ज़ख़्म देकर जो उसका जी न भरा
दिल उसका मेरे दिल तक पहुँचा
ख़ुशी की प्यास बढ़ती गयी जब
मैं भी दर्द के हासिल तक पहुँचा
धुँआ-धुँआ है आँख मेरी अब रोज़
कि मैं अपने ही साहिल तक पहुँचा
हक़= truth, righteousness
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३
Gaurav said,
March 13, 2008 at 1:05 pm
BAHUT BADIYA LIKHA HAI KAISE ITNA BADIYA LIKH LETE HO
विनय प्रजापति said,
March 13, 2008 at 7:58 pm
sab ishwar ki kripa hai!