कोई तुमसे मुलाक़ात का बहाना ढूँढ़ता है
फिर से वही गुज़रा हुआ ज़माना ढूँढ़ता है
वह एक पल जो थम के रह गया है कहीं
उस पल में बीता हुआ अफ़साना ढूँढ़ता है
जिसमें शराब गुलाबी मिला करती थी वहाँ
आज अपने माज़ी का वह पैमाना ढूँढ़ता है
जिसको सुनकर के तुम वापिस लौट आओ
अपनी सदाओं का वह नज़राना ढूँढ़ता है
शायिर: [...]
Archive for March 13th, 2008
13 Mar
कोई तुमसे मुलाक़ात का बहाना ढूँढ़ता है
13 Mar
तुम न समझोगे
बिन तुम्हारे मैं क्या हूँ तुम न समझोगे
आप तन्हाई की सदा हूँ तुम न समझोगे
तुम्हारे ग़मे-इश्क़ में जो चाँद पिरोता रहा
मैं साँस का वो टुकड़ा हूँ तुम न समझोगे
तुम्हारे दिल में जो हर लम्हा बहता है
मैं लहू का वही क़तरा हूँ तुम न समझोगे
तुमने जिसे बेकार समझकर फाड़ दिया
मैं उसी ख़त का टुकड़ा हूँ तुम [...]
13 Mar
और दाँव अपनी जाँ का
और दाँव अपनी जाँ का किसने लगाया होगा
फिर इश्क़ ने फ़रहाद कोई बुलाया होगा
यूँ ही नहीं बिगड़ता है कोई किसी बात पे
तुमने ज़रूर नमक में छालों को गलाया होगा
इक मेरे’ कौन दूसरा दुनिया में तन्हा है
तुमसे ऐसा रिश्ता भला किसने निभाया होगा
न कोई आहट है ‘नज़र’ न कोई ख़बर है
क़ासिद ने ग़लत दरवाज़ा खटखटाया होगा
क़ासिद= [...]
13 Mar
मोती दो’ साथ पिरोना और
मोती दो’ साथ पिरोना और
लड़ना और बिगड़ना और
बात अलग है तन्हा जीना
तन्हाई से बातें करना और
आधी-आधी कहते हैं सब
हिचकना और झिझकना और
रहते तो हैं साथ मगर
प्यार की बातें करना और
बिगड़ना= anger, लड़ना= fight, हिचकना= tardiness, waver
झिझकना= shyness
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३
13 Mar
फ़िराक़ को अजल विसाल को जीवन जाना
फ़िराक़ को अजल विसाल को जीवन जाना
यह कि झूठ को सच मतलब को मन जाना
वहम की धूल जब गिरी पलकों से
हमने सच और झूठ का सारा फ़न जाना
आँखों से आपकी तस्वीर उतारी न गयी
हमने शबो-रोज़ चाँद को रोशन जाना
जिस्म ख़ाहिशमंद था रूह सुलगती थी
हमने बुझते बादलों को सावन जाना
हम भी शाइरी के फ़न सीखने लगे [...]




















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