दर्द सुलगते क्यों हैं जलते क्यों नहीं
मेरी आँखों में अब्र हैं बरसते क्यों नहीं
यह तुमको देखकर ही शायद बरसेंगे…
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३
10 Mar
Posted by विनय in मेरी त्रिवेणी. Tagged: अब्र, आँखें, इंतिज़ार, इश्क़, दर्द, प्यार, मोहब्बत, शायद, cloud, eyes, love, pain, perhaps, waiting. Leave a Comment
दर्द सुलगते क्यों हैं जलते क्यों नहीं
मेरी आँखों में अब्र हैं बरसते क्यों नहीं
यह तुमको देखकर ही शायद बरसेंगे…
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