Archive for March 10th, 2008

उफ़! यह मोहब्बत

“उफ़! यह मोहब्बत भी क्या चीज़ है
कभी बोझल आँखों से ख़ूँ टपकता है
कभी नब्ज़ बुझती है साँस जलती है”
पास मेरे जो तेरी तस्वीर नहीं
हाथों में मेरी तक़दीर नहीं
जिस तरह जी रहा हूँ जानता हूँ
सीने में साँसों की ज़ंजीर नहीं
मेरी राह से दिल से गुज़रती थी
चाँद जैसे रोज़ सँवरती थी
एक तरफ़ा मैं मरता था तुम पे
क्या [...]

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एक मैं ही था शहंशाह सारे जहाँ का

एक मैं ही था शहंशाह सारे जहाँ का
जब तलक साया था सर पे हुमा का
मेरी शिकस्त ही तक़दीर हुई मेरी
जब जाना हुआ मेरे दर से हुमा का
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

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कुछ यूँ क़त्ल हुआ यह वक़्त

कुछ यूँ क़त्ल हुआ यह वक़्त
कि क़तराए-ख़ूँ तक न गिरा
अबकि हारे तो टूट जाये ‘नज़र’
मेरे दिलसिताँ, तेरा नाम लेकर
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

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शबनम यूँ सुलगी रात सोते पत्तों पर

शबनम यूँ सुलगी रात सोते पत्तों पर
जैसे वह मुझको मिले और मिले भी ना
चाँद खिड़की पर बैठकर मुझे देखता है…
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

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दर्द सुलगते क्यों हैं

दर्द सुलगते क्यों हैं जलते क्यों नहीं
मेरी आँखों में अब्र हैं बरसते क्यों नहीं
यह तुमको देखकर ही शायद बरसेंगे…
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

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