नित उड़ता हूँ तेरी कजरारी अँखियों में
मैं रंग-बिरंगे सपनों की छतरी लेके
साँवले का मन लुभाके, बिजली गिराके
राधा चली कहाँ ऐसे गगरी सँभाले
इठलाती है बल खाती है जिया जलाती है
राधा काहे साँवले से इतना इतराती है
हरी चुनरिया पवन जब उसकी उड़ाती है
गुलाबी बदन की भीगी धूप उड़ाती है
साँझ का घूँघट ओढ़े पनघट उतरती है
गगरिया छलकाती द्वार [...]
Archive for March 8th, 2008
8 Mar
नित उड़ता हूँ तेरी कजरारी अँखियों में
8 Mar
तेरी जगह कौन ले सकता है
तेरी जगह कौन ले सकता है मेरे जीवन में
तुम ही तो थी तुम ही तो हो मन आँगन में
सपनों की पुरवाइयाँ तेरा बदन को छूती थीं
तेरे रूप की कहानी नित मुझसे कहती थीं
आज भी वह सारे सिलसिले सब वैसे हैं
गीली राहों की गीली-गीली मिट्टी के जैसे हैं
आज भी तेरे द्वार खड़ा हूँ मैं तेरी लगन [...]
8 Mar
वह शाम फिर आयी
वह शाम फिर आयी
वह गुलाबी चाँद फिर आया
वह फिर ढहीं बारिश की दीवारें
इल्ज़ाम मुझपर आया
कोई गुमाँ नहीं हुआ
कोई ज़ख़्मे-निहाँ नहीं पिया
सब बयाँ हैं
किसलिए दर्द असर पाया
वह शाम फिर आयी
वह गुलाबी चाँद फिर आया
मुझको यह नुमाया है
ख़त किसलिए जलाया है
शबो-रोज़ के पुरज़े क्यों किये
क्यों यह ज़हर खाया
वह शाम फिर आयी
वह गुलाबी चाँद फिर आया
इक उम्र दराज़ [...]




















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