अश्को-अक्स चश्म में नहीं है

March 6, 2008 at 3:38 pm (मेरा गीत) (, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , )

जितनी मै उन आँखों में थी
उतनी और कहाँ
जितना सुरूर उन आँखों में था
उतना और कहाँ

रोज़ शाम दरवाज़े पे बैठता हूँ
आज वह कहाँ
नक़्शए-क़दम उड़ गये धूल में
आज वह कहाँ

उसने शहर बदला है या घर
जानिब वह कहाँ
यह सीना ख़ाली हुआ जाये है
मौत वह कहाँ

अश्को-अक्स चश्म में नहीं है
न वह यहाँ, न हम यहाँ…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

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