Archive for March 6th, 2008

यह कैसा लम्हा है

यह कैसा लम्हा है
यह कैसा एहसास है
तू पलकों में क़ैद है
दिल के पास है
क्या देखूँ तेरे सिवा
क्या चाहूँ तेरे सिवा
मेरे दर्दे-दिल की
तू ही तो है दवा
खिलते हुए लम्हे सब
खिल गये हैं अब
मैं तुझको महसूस करूँ
साँस लूँ जब
आज जो देखा तुझे
याद आया मुझे
लोग दीवाना क्यों
कहते है मुझे
जब निगाहों ने छुआ
यह एहसास हुआ
तूने भी मुझको सनम
प्यार है [...]

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अश्को-अक्स चश्म में नहीं है

जितनी मै उन आँखों में थी
उतनी और कहाँ
जितना सुरूर उन आँखों में था
उतना और कहाँ
रोज़ शाम दरवाज़े पे बैठता हूँ
आज वह कहाँ
नक़्शए-क़दम उड़ गये धूल में
आज वह कहाँ
उसने शहर बदला है या घर
जानिब वह कहाँ
यह सीना ख़ाली हुआ जाये है
मौत वह कहाँ
अश्को-अक्स चश्म में नहीं है
न वह यहाँ, न हम यहाँ…
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: [...]

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कुछ ऐसा ही होता है

ज़ोर से दिल धड़कता है (हाँ धड़कता है)
तूफ़ान साँसों में चलता है (हाँ चलता है)
आँखें ठहर जाती हैं
तस्वीरें गुज़र जाती हैं
जब प्यार किसी से होता है
कुछ ऐसा ही होता है…
दिल इक़रार करता है (हाँ डरता है)
पर इज़हार से डरता है (हाँ करता है)
बेचैन हो जाता है
सब कुछ बदल जाता है
जब प्यार किसी से होता है
कुछ [...]

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