ज़हर पीकर जीने चले

ज़हर पीकर जीने चले
कच्चे-पक्के ज़ख़्म सीने चले

आँसू सूखे हुए थे
पलकों से बरसते हैं
सितारे सारी रात
चाँद को तरसते हैं

एक पूरा दिन पीने चले
कच्चे-पक्के ज़ख़्म सीने चले

महके-महके लगते हैं
गीले पलाश के पल
उड़ती फिरती रहती है
तेरी प्यास की धूल

काग़ज़ी यह आइने जले
कच्चे-पक्के ज़ख़्म सीने चले


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

2 Responses to this post.

  1. जी शुक्रिया, आप भी अच्छा लिख लेते हैं।

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  2. बढिया रचना है।

    आँसू सूखे हुए थे
    पलकों से बरसते हैं
    सितारे सारी रात
    चाँद को तरसते हैं

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