ज़हर पीकर जीने चले
कच्चे-पक्के ज़ख़्म सीने चले
आँसू सूखे हुए थे
पलकों से बरसते हैं
सितारे सारी रात
चाँद को तरसते हैं
एक पूरा दिन पीने चले
कच्चे-पक्के ज़ख़्म सीने चले
महके-महके लगते हैं
गीले पलाश के पल
उड़ती फिरती रहती है
तेरी प्यास की धूल
काग़ज़ी यह आइने जले
कच्चे-पक्के ज़ख़्म सीने चले
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३




















Posted by विनय प्रजापति on February 28, 2008 at 12:08 AM
जी शुक्रिया, आप भी अच्छा लिख लेते हैं।
Posted by paramjitbali on February 27, 2008 at 11:40 PM
बढिया रचना है।
आँसू सूखे हुए थे
पलकों से बरसते हैं
सितारे सारी रात
चाँद को तरसते हैं