यह शाम की धूप

February 26, 2008 at 8:00 am (मेरी त्रिवेणी) (, , , , , , , , , , , , , )

कोई हमसायादार पेड़ नहीं मिला
ज़हर मिले तो ज़हर भी खा लूँ

यह शाम की धूप बहुत कड़ी है…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

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