वो वक़्त
वो वक़्त कि वक़्त हमें सिर पे लिए फिरता था
अब है कि मेरे दरवाज़े से गुज़रते हुए डरता है
कारू के ख़ज़ाने में कितने सिक्के हैं, गिनना ज़रा!
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३
February 26, 2008 at 9:33 am (मेरी त्रिवेणी) (कारू, ख़ज़ाना, दरवाज़ा, वक़्त, सिक्का, ज़िन्दगी, coin, door, karu, life, money, time, tresure)
वो वक़्त कि वक़्त हमें सिर पे लिए फिरता था
अब है कि मेरे दरवाज़े से गुज़रते हुए डरता है
कारू के ख़ज़ाने में कितने सिक्के हैं, गिनना ज़रा!
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