वह मौसम इक बार

February 26, 2008 at 10:54 pm (मेरा गीत) (, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , )

वह मौसम इक बार फिर सजा दे
प्यार करने की मुझको सज़ा दे
दीवानों की तरह तुझको देखे जाऊँ
हाथों की लकीरों में वह क़ज़ा दे

अरमान पिघलकर ख़त्म न हो जायें
दिल में साँसें दफ़्न न हो जायें
अपने सीने से लगा ले मुझे
दिल में अपने मुझको जगह दे

तेरी राहों पर निगाह है मेरी
मेरे दिल में सिर्फ़ चाह है तेरी
मेरे जीवन को अपनी चाहतों में डुबा दे
मेरे सनम जीने की मुझको वजह दे

वह मौसम इक बार फिर सजा दे
प्यार करने की मुझको सज़ा दे…

सूनी-सूनी आँखें रूख़ी-रूख़ी आँखें
ख़ाली-ख़ाली है सीना ख़ुश्क़ हैं साँसें
जुदा रहके जुदाई में जीना मुमकिन नहीं
मेरे प्यार को अपने प्यार की फ़िज़ा दे

दीवानों की तरह तुझको देखे जाऊँ
हाथों की लकीरों में वह क़ज़ा दे…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: ३० अप्रैल २००३

2 Comments

  1. limit said,

    February 27, 2008 at 9:39 am

    वह मौसम इक बार फिर सजा दे
    प्यार करने की मुझको सज़ा दे
    ” atee sunder, aapke saree nazam , geet , dilko chune walen hain, i am learning from you to write’
    Regards

  2. विनय प्रजापति said,

    February 27, 2008 at 3:45 pm

    आप अगर मुझे सम्मान के क़ाबिल समझती हैं तो आपका स्वागत है और मैं आपको तहे-दिल से धन्यवाद देता हूँ।

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