कुछ तो बोलो!

February 26, 2008 at 5:39 pm (मेरी त्रिवेणी) (, , , , , )

क्यों लोग यहाँ जमा हैं?
क्यों वह उदास बैठा है?

कुछ तो बोलो! मेरी साँसें उखड़ रही हैं


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

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