कितना काला पड़ गया हूँ

मैं तेरे इश्क़ की छाँव में जल-जलकर
कितना काला पड़ गया हूँ, आकर देख

तू मुझे हुस्न की धूप का एक टुकड़ा दे!


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

2 Responses to this post.

  1. Posted by Brijmohan shrivastava on April 9, 2008 at 11:25 AM

    रंगीन फूल हजारों हजार मिलते है
    स्याह गुलाब मगर मुश्किलों से मिलते है

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