कितना काला पड़ गया हूँ

February 26, 2008 at 9:10 am (मेरी त्रिवेणी) (, , , , , , , , , , , , )

मैं तेरे इश्क़ की छाँव में जल-जलकर
कितना काला पड़ गया हूँ, आकर देख

तू मुझे हुस्न की धूप का एक टुकड़ा दे!


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

2 Comments

  1. Brijmohan shrivastava said,

    April 9, 2008 at 11:25 am

    रंगीन फूल हजारों हजार मिलते है
    स्याह गुलाब मगर मुश्किलों से मिलते है

  2. विनय प्रजापति said,

    April 9, 2008 at 3:15 pm

    kya baat hai brij saahab!

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