ख़िज़ाँ मुस्कुराने लगी

February 26, 2008 at 8:19 pm (मेरा गीत) (, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , )

ख़िज़ाँ मुस्कुराने लगी
सूखे पत्ते उड़ाने लगी

दरख़्त की शाख़ों पर
धूप की बूँदें नहीं
सूरज का दरिया है

छोटी-छोटी
नन्हीं मासूम बेलें
शाख़ों से खुलकर
तड़फड़ाने लगीं…

ख़िज़ाँ मुस्कुराने लगी
सूखे पत्ते उड़ाने लगी

पाँव सूखे थे
ज़मीं ने सोख लिये
मुड़के देखा तो
निशाँ कहीं न थे

रात आयी तो
चाँद बरसने लगा
सहर फिर मुझे
आज़माने लगी

ख़िज़ाँ मुस्कुराने लगी
सूखे पत्ते उड़ाने लगी


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २५ अप्रैल २००३

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