हमने आसमाँ से टूटके
गिरते सितारे को
ज़मीं पे आते देखा है
आसमाँ पे था तो चमकता था
ज़मीं पे है तो दहकता है
फ़र्क़ है बस थोड़ा-सा
‘कितना है?’ इतना है!
जाओ उठा लाओ उसे…
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३
26 Feb
हमने आसमाँ से टूटके
गिरते सितारे को
ज़मीं पे आते देखा है
आसमाँ पे था तो चमकता था
ज़मीं पे है तो दहकता है
फ़र्क़ है बस थोड़ा-सा
‘कितना है?’ इतना है!
जाओ उठा लाओ उसे…