अंगीठी में सुलगता कोयला झलोगे
तब जाकर धुँआ ज़रा कम उठेगा
आँसू अपनी आँख के सब पोंछ दो
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३
26 Feb
Posted by विनय in मेरी त्रिवेणी. Tagged: अंगीठी, आँख, आँसू, कोयला, धुँआ, ज़िन्दगी, coal, eyes, fume, life, stove, tears. Leave a Comment
अंगीठी में सुलगता कोयला झलोगे
तब जाकर धुँआ ज़रा कम उठेगा
आँसू अपनी आँख के सब पोंछ दो
विनय प्रजापति 'नज़र'
Vinay Prajapati 'NAZAR'
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