तुमको लौट के यहीं आना है
तुमको लौट के यहीं आना है (यहीं आना है)
तुम मानो या न मानो
मेरा दिल तेरा आशियाना है (आशियाना है)
तुम मानो या न मानो
एक इल्ज़ाम देकर जा रहे हो ग़ैर की बाँहों में
कभी तो तुम्हें उसको ठुकराना है
तुम मानो या न मानो
हम दोस्त थे तुमने अदू मान लिया जाने दो
मुझे आज रब को भी आज़माना है
तुम मानो या न मानो
देखता हूँ यह रंग यह तेवर कब तलक हैं
तुमको ख़ुद चलके मेरे पास आना है
तुम मानो या न मानो
जो गिरह तुमने ख़ुद डाली हमारे रिश्ते में
उसको तुम्हें दुनिया से छुपाना है
तुम मानो या न मानो
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १४ अप्रैल २००३
