रक़ाबी चाँद जला दो

February 19, 2008 at 6:31 pm (मेरी नज़्म) (, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , )

रक़ाबी चाँद जला दो
यह रात चाँदनी हो जाये
कभी तो पास बुला लो
तेरी नज़दीकियों का
मुझे एहसास हो जाये

गुलाबी शाम ढलती है
रोज़ गुज़रती हो
मेरे घर के सामने से
मैं दिल थाम के बैठा रहता हूँ
आइना जब भी हो हाथों में
उससे तेरी बातें करता हूँ…

रक़ाबी चाँद जला दो
यह रात चाँदनी हो जाये
एक रिश्ता बना लो
मुलाक़ात लाज़मी हो जाये

तेरे सिले हुए लबों पर
क्या इक़रार होगा
मेरा ख़्याल है कि इज़हार होगा
बात कोई नही, बात तुम में है
मैं न हूँ शायद तुझमें
पर तू मुझमें है…

रक़ाबी चाँद जला दो
यह रात चाँदनी हो जाये


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९

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