ख़ामोशी ही ख़ामोशी है

ख़ामोशी ही ख़ामोशी है अंधेरी रातों में
चाँद भी कहीं खो गया है तारों में

तन्हाई है तन-मन में,
ख़ाबों का आशियाँ बनाया था हमने
वह बिखरा पड़ा है यहीं-कहीं पे,
फूल-पत्तों का मौसम जा चुका है
पतझड़ लगा है बरसने…
पीले पत्ते लगे हैं गिरने…

ख़ामोशी ही ख़ामोशी है अंधेरी रातों में
चाँद भी कहीं खो गया है तारों में

मौसम के फूलों में जो ख़ुशबू थी
वह अब नहीं है उनमें,
कैसे बेरंग हुए सब यहाँ पर
कोई अपना नहीं है इनमें,
बादलों का मौसम आ रहा है
सावन लगा है तरसने…

ख़ामोशी ही ख़ामोशी है अंधेरी रातों में
चाँद भी कहीं खो गया है तारों में

अब कहाँ है रोशनी मैं हूँ बेख़बर,
जाने कब होगा ख़त्म
मंज़िलों का यह तन्हा सफ़र,
जाने कब आयेगा वह मेरा हमसफ़र
दिल बेख़बर, दिल बेसबर…
दिल बेसबर, दिल बेख़बर…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९

2 Responses to this post.

  1. Posted by mehhekk on February 19, 2008 at 5:56 PM

    मौसम के फूलों में जो ख़ुशबू थी
    वह अब नहीं है उनमें,
    कैसे बेरंग हुए सब यहाँ पर
    कोई अपना नहीं है इनमें,
    बादलों का मौसम आ रहा है
    सावन लगा है तरसने

    bahut badhiya

    Reply

  2. अब कहाँ है रोशनी मैं हूँ बेख़बर,
    जाने कब होगा ख़त्म
    मंज़िलों का यह तन्हा सफ़र,
    जाने कब आयेगा वह मेरा हमसफ़र
    दिल बेख़बर, दिल बेसबर…
    दिल बेसबर, दिल बेख़बर…

    ” very beautifully compiled ,last paragraph is very heart touching.”
    Regards

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