बिछड़ के रहना सीख लिया है
क्या तुमने, क्या तुमने
बिछड़ के रहना सीख लिया है
क्या तुमने, क्या तुमने…
क्या वहाँ तक, वहाँ तक
मेरी आवाज़, मेरी सदा जाती नहीं
क्या वहाँ तुझे, वहाँ तुझे
मेरी बातें, मेरी याद सताती नहीं
बिछड़ के रहना सीख लिया है
क्या तुमने, क्या तुमने
बिछड़ के रहना सीख लिया है
क्या तुमने, क्या तुमने…
हर तरफ़ तू नज़र आती है
पल-पल तू दिल में समाती है
बेवफ़ा तू हो सकती नहीं
दिल से जुदा तू हो सकती नहीं
क्या वहाँ तक, वहाँ तक
मेरी आवाज़, मेरी सदा जाती नहीं
क्या वहाँ तुझे, वहाँ तुझे
मेरी बातें, मेरी याद सताती नहीं
बिछड़ के रहना सीख लिया है
क्या तुमने, क्या तुमने
बिछड़ के रहना सीख लिया है
क्या तुमने, क्या तुमने…
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९




















Posted by mehhekk on February 20, 2008 at 9:22 PM
bahut khub, aur ye achha hai, ab koi shayad post ki copy na kare…