तू एक बार देख ले पीछे मुड़के

February 18, 2008 at 11:19 pm (मेरा गीत) (, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , )

तू एक बार देख ले पीछे मुड़के
हम हैं वहीं जहाँ थे कभी अकेले
ऐसा यह क्या हो गया अन्जाने
दिल मेरा क्यों टूट गया रब जाने

तुम गये तन्हा हो गयी ज़िन्दगी
तुम गये दिल से गयी हर ख़ुशी
हर लम्हा तू मुझे याद आ रही है
याद आ के मुझे तड़पा रही है

तू एक बार देख ले पीछे मुड़के
हम हैं वहीं जहाँ थे कभी अकेले

यारा, तेरे चाहने वाले हम हैं
मेरे दामन में कितने ग़म हैं
कैसे रहते हैं हम यहाँ ज़िन्दा
जैसे साहिल पे मिट्टी का घरौंदा

तू एक बार देख ले पीछे मुड़के
हम हैं वहीं जहाँ थे कभी अकेले
तू आ कभी देख ले मेरी बेख़ुदी
तू आ कभी लौटा दे मेरी ज़िन्दगी

यारा तू ज़िन्दगी, तू है ज़िन्दगी…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९

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