एक मेरा सपना तू ही तो थी

एक मेरा सपना तू ही तो थी जाना
दूर जो गयी तू हो गया वह बेग़ाना
इंतिज़ार तेरा करता हूँ तेरी क़सम
हर लम्हा तेरा नाम जपता हूँ सनम
हाल मेरा बद से बद्तर हो गया है
ज़िंदगी का हर पल बेज़ार हो गया है

एक मेरा सपना तू ही तो थी जाना
दूर जो गयी तू हो गया वह बेग़ाना
अब तेरी राहों में रहता हूँ यार मेरे
कर दिये नाम तेरे मैंने दिन-रात मेरे
तेरी साँसों की ख़ुशबू, बसी है मन मे‍
खिलते हैं जो गुल यार तू है उनमें

एक मेरा सपना तू ही तो थी जाना
दूर जो गयी तू हो गया वह बेग़ाना
सीख रहा हूँ मैं, तन्हा कैसे रहते हैं
तन्हा रहकर, कैसे हर पल जीते हैं


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९

2 Responses to this post.

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  2. Posted by manish on February 20, 2008 at 2:01 PM

    सचमुच अच्छा लगा…

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