यह कोरे काग़ज़

February 16, 2008 at 11:13 pm (मेरा गीत) (, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , )

यह कोरे काग़ज़ करते हैं दिल की बात
जैसे यह कोरे हैं वैसे मेरे दिन-रात
अपनी मुलाक़ात कब मुकम्मल हुई थी
दर्द मेरे दिल में बढ़ते रहे इफ़रात…

इन अफ़सानों में अपना एक किरदार है
ज़ुबाँ से निकला हर लफ़्ज़ किरायेदार है
गुज़रती तारीख़ों में तेरी राह तकते हैं
यह फ़ैसला कैसे हो किस पे एतबार है

यह कोरे काग़ज़ करते हैं दिल की बात
जैसे यह कोरे हैं वैसे मेरे दिन-रात…

बैठते हैं जब अकेले यूँ तन्हाई में हम
एक ख़त लिखने की सोचते हैं तुम्हें हम
तभी एक आहट-सी कानों में जाती है
और फिर खिड़की से देखते हैं तुम्हें हम

अपनी मुलाक़ात कब मुकम्मल हुई  थी
दर्द मेरे दिल में बढ़ते रहे इफ़रात…

संवाद:
हर कोरा काग़ज़ यूँ फड़फड़ाता है
जैसे आवाज़ देकर हमें बुलाता है
एक तकलीफ़ दिल में उठती है
जब आपका ख़्याल हमें आता है


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९

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