पहला-पहला नशा

February 15, 2008 at 7:25 pm (मेरा गीत) (, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , )

जादू जैसा छाया पहला-पहला नशा
जी में आये पंख खोल उड़ जाऊँ मैं
आस्माँ से आगे निकल जाऊँ मैं

मस्ती दिल पर छायी अनजानी-सी
उड़ती फिरे है जैसे फूलों पर तितली
दिल में जाने कैसा तूफ़ान उठा है
यूँ लगता है हर पल मुझसे रूठा है

तेरा ग़म पाया ख़ुशी मुझको मिली
लगता है खिल रही दिल की कली
जादू जैसा छाया पहला-पहला नशा

तेरे ख़ाब आते रहे मुझको रातभर
मैं कहाँ जाऊँगा दूर तुमसे बिछड़कर
अफ़साना बन चुका खो गया दिल
इल्तिजा सुन ले मुझसे आकर मिल

यह जादू प्यार है मैंने अब जाना
जिसको ढूँढ़ रहा था वह मुझे मिला
जादू जैसा छाया पहला-पहला नशा


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९

4 Comments

  1. bhairu said,

    February 20, 2008 at 6:22 pm

    जादू जैसा छाया पहला-पहला नशा
    जी में आये पंख खोल उड़ जाऊँ मैं
    आस्माँ से आगे निकल जाऊँ मैं

    सुन्दर पंक्तियाँ…

  2. विनय प्रजापति said,

    February 20, 2008 at 6:48 pm

    bhairu, full poetry quoting is not allowed. just convey msg. your IP is 59.95.185.177. I can block it… if I found you try to spam weblog.

  3. प्रीतीश बारहठ said,

    February 23, 2008 at 3:27 pm

    ख़ुदा बचाये तुझे इश्क़ की लहरों से
    कहते हैं दरिया में तूफ़ान उठा करता है

    दिल की दुनिया में तेरे आने का ग़म है
    होके बहुत नाराज़ मेरा मेहमान उठा करता है

  4. विनय प्रजापति said,

    February 23, 2008 at 5:34 pm

    प्रीतीश बारहठ, आपका अंदाज़े-बयाँ अच्छा लगा। लेकिन कुछ और मज़ा आता अगर आप अपना चिट्ठा-लिंक देते।

Post a Comment