जब पतझड़ के मौसम आते हैं

February 15, 2008 at 1:44 pm (मेरा गीत) (, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , )

तुझे देखा तू ही मेरी हमनशीं
तुझे चाहा तू ही मेरी जान-सी
तुझे देखा मैंने तुझे चाहा तुझे
सिर्फ़ तू ही मेरी सखी, सखी…

जब पतझड़ के मौसम आते हैं
पेड़ों से पत्ते पीले झड़ जाते हैं
जब पतझड़ के मौसम आते हैं
पेड़ों से पत्ते पीले गिर जाते हैं
पत्ते वह फिर से वापस आते हैं
पेड़ों पर फिर से वापस आते हैं
फूलों के गुच्छे हवा में लहराते हैं
आते-आते दिल क़रीब आते हैं

तुझे देखा तू ही मेरी हमनशीं
तुझे चाहा तू ही मेरी जान-सी
तुझे देखा मैंने तुझे चाहा तुझे
सिर्फ़ तू ही मेरी सखी, सखी…

परवाने शमअ पर मर मिटते हैं
आशिक़ ऐसे कहाँ कब मिलते हैं
दीवाने शमअ पर मर मिटते हैं
साहिब, ऐसे कहाँ अब मिलते हैं
होते हैं उजाले मिटते जाते अँधेरे
दो दिल मिल जायें होते हैं सवेरे
दिए जलते हैं व गुल खिलते हैं
लम्हे रुकते हैं, ख़्याल बहते हैं

तुझे देखा तू ही मेरी हमनशीं
तुझे चाहा तू ही मेरी जान-सी
तुझे देखा मैंने तुझे चाहा तुझे
सिर्फ़ तू ही मेरी सखी, सखी…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९

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