एक ही रास्ता जब है दोनों का
फिर क्यों दोनों तन्हा
फिर क्यों दोनों तन्हा
मेरा मरहम है तू
मेरा मज़हब है तू
आँखों में तेरा ही चेहरा
कंचन भी तू है
चंदन भी तू है
दिल चाहे तेरा ही रहना
एक ही रास्ता जब है दोनों का
फिर क्यों दोनों तन्हा
फिर क्यों दोनों तन्हा
मन मन्दिर है तू
कितनी सुन्दर है तू
तेरे बिन लागे दिल ना
मेरा मंज़िल तू है
मेरा साहिल तू है
दिल चाहे तुझको पाना
एक ही रास्ता जब है दोनों का
फिर क्यों दोनों तन्हा
फिर क्यों दोनों तन्हा
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९




















Posted by विनय प्रजापति on February 14, 2008 at 7:02 PM
what are you trying to say? If I considered you as spamming on my weblog I will block you dear. It’s not because you’re writng long comments because enter invalid e-mail address (abhilsha_verma@orkut.com). I hope in future you will remember this. we are here to share beautiful thoughts not to bother anyone.
Posted by santosh on February 14, 2008 at 6:21 PM
बहारों का मौसम
शाख़ों पर खिलने लगा है…
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यह कारवाँ किस जगह आ रुका है
ज़िन्दगी को हासिल नहीं मिल रहा है…
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ग़म देना उनकी फ़ितरत में शामिल होगा
मेरी फ़ितरत तो मुहब्बत देने की रही है….
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मैं मंज़िल से दूर सही
ख़ाबों का एक घरौंदा रखता हूँ…
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काश वह कोई गुल होती
मैं उसे अपने लबों से चूम लेता…
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कभी हम मौसम थे
कभी ख़ुद मौसम था…
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रहूँ मैं कैसे जुदा
मैं जुदा रह नहीं सकता….
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सराहनीय रचनाएँ…