जब से भूल जाना चाहा तुमको

February 14, 2008 at 12:02 pm (मेरी नज़्म) (, , , , , , , , , , , , , , , , , , , )

जब से भूल जाना चाहा तुमको
तेरी याद और भी आती है
सपना क्या कभी कोई ऐसा हुआ
जो बिखरा नहीं
बची राख को आँधी
मेरी कब्र तक उड़ा ले जाती है

तुम फिर क्यों मेरी निगाहों में
भर आये आँसू
क्या कोई दर्द हुआ दिल में
या फिर वह तस्वीर मिल गयी
यह तो बताये कोई
मुझे तू क्यों याद आती है?

जब से भूल जाना चाहा तुमको
तेरी याद और भी आती है

चाँद है आसमाँ पर, ज़मीं पर नहीं
बस बात इतनी है जो मुझे तुमसे
दूर नहीं जाने देती है आँसू,
क्या हुआ ऐसा? गुल खिल गये
जो दिए जल गये
क्या यह सब ख़ाब है?
मुझे तू नज़र आती हैं…

जब से भूल जाना चाहा तुमको
तेरी याद और भी आती है

निगाहों में, नज़ारों में, तू बेवफ़ा
सपनों से दूर जा, न याद आ


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९

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