किस राह को चल रहे थे

किस राह को चल रहे थे
किस राह को हम चल दिये,
उनसे प्यार लिए
हम चले इक नये सफ़र पर,
लुटा दिया सारा जो कुछ था
उनकी इक नज़र पर,
कुछ कर गुज़रने की तमन्ना लिए
अकेले हर मंज़िल तक चल रहे,
जाने किसका ख़्याल लिये…

दूरियाँ बहुत हैं लम्बे हैं रास्ते
मगर हम चले किसी के वास्ते
जिस डगर पर भी रुके
वहाँ कुछ अपने बन गये
किस राह को हम चल रहे थे
किस राह को हम चल दिये…

इक बात थी दिल में
सबको प्यार देने की
और हमेशा हम बाँटते रहे,
उड़ते बादलों की तरह
हम चले हर डगर, हर नगर
जाने क्यों छा गये, बेग़ाने शहर पर

क्या चाहें वह हमसे हम समझ गये
कोई मिले इस सफ़र में
तारीख़ों के गुज़रते मंज़र में
यह क्या हुआ हम कहाँ रुक गये
फिर सभी हमसे मिल गये
किस राह को चल रहे थे
किस राह पर हम रुक गये…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९

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