बहारों का मौसम
शाख़ों पर खिलने लगा है
मज़िलों की बेताबी का
चाँद अब दिखने लगा है
सफ़र बहुत तवील है
और लम्हें मुख़्तसर…
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २०००-२००१
6 Feb
बहारों का मौसम
शाख़ों पर खिलने लगा है
मज़िलों की बेताबी का
चाँद अब दिखने लगा है
सफ़र बहुत तवील है
और लम्हें मुख़्तसर…
Posted by विनय प्रजापति on February 6, 2008 at 11:27 PM
@ mehhekk
it’s great… you’re using dictionary.
Posted by mehhekk on February 6, 2008 at 8:46 PM
bahut badhiya,.see i used the dic today,so safar is long nd lamhe r short.