रोशनी से दीवारों के साये

रोशनी से दीवारों के साये मिटायेंगे
ढूँढ़कर वह सब लायेंगे, ढूँढ़ लेंगे
जो क़िस्मत की लकीरों में बँधा है

मुक़ाम का निशाँ हमने गढ़ा है…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २०००-२००१

One Response to this post.

  1. Posted by mehhekk on February 6, 2008 at 8:50 PM

    very nice.

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