जब-जब चाँद को
छूना चाहा है मैंने
बादलों के साये
उसको दूर ले गये
मैं अब कि ऐसा
मौसम बनाऊँगा
बादलों के क़तरे भी
न नज़र आयेंगे
मेरी चन्द्रमा तुझे
लकीरों में सजाऊँगा
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २०००-२००१
6 Feb
Posted by विनय in मेरी नज़्म. Tagged: चन्द्रमा, चाँद, बादल, मौसम, हौसला. Leave a Comment
जब-जब चाँद को
छूना चाहा है मैंने
बादलों के साये
उसको दूर ले गये
मैं अब कि ऐसा
मौसम बनाऊँगा
बादलों के क़तरे भी
न नज़र आयेंगे
मेरी चन्द्रमा तुझे
लकीरों में सजाऊँगा
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