Archive for February 6th, 2008

थकने लगी है मोहब्बत की शाम

थकने लगी है मोहब्बत की शाम
सफ़र के राही को न मिला है मक़ाम
बुझने लगी है मोहब्बत की रोशनी
रात का राही हो रहा है बदनाम
मोहब्बत की चाँदनी ने ओढ़ ली है
अमावस की काली चादर
पर नज़र नहीं आते दूर तलक
उनकी बेवफ़ाई के बादल
मोहब्बत के थकने लगे हैं क़दम
और जिस्म से निकलता है दम
होश आँखों में बाक़ी है [...]

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सफ़र बहुत तवील है

बहारों का मौसम
शाख़ों पर खिलने लगा है
मज़िलों की बेताबी का
चाँद अब दिखने लगा है
सफ़र बहुत तवील है
और लम्हें मुख़्तसर…
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २०००-२००१

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यह कारवाँ किस जगह आ रुका है

यह कारवाँ किस जगह आ रुका है
ज़िन्दगी को हासिल नहीं मिल रहा है
हमने अब तक ऐसी मुहब्बत की है
शायद जिसमें शामिल नहीं दिल रहा है
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २०००-२००१

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रोशनी से दीवारों के साये

रोशनी से दीवारों के साये मिटायेंगे
ढूँढ़कर वह सब लायेंगे, ढूँढ़ लेंगे
जो क़िस्मत की लकीरों में बँधा है
मुक़ाम का निशाँ हमने गढ़ा है…
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २०००-२००१

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जब-जब चाँद को

जब-जब चाँद को
छूना चाहा है मैंने
बादलों के साये
उसको दूर ले गये
मैं अब कि ऐसा
मौसम बनाऊँगा
बादलों के क़तरे भी
न नज़र आयेंगे
मेरी चन्द्रमा तुझे
लकीरों में सजाऊँगा
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २०००-२००१

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