क़िस्मत की लकीरें
मुझे तुझसे दूर रखती हैं
यह नम आँखें
तेरी याद में चाँद तकती हैं
आँखें जब बंद करता हूँ
मैं तेरा चेहरा देखता हूँ
गुलों की तरह
यह साँसों में महकता है
माहताब की तरह
ख़ाबों में दमकता है
भूलता नहीं कुछ भी
सिलसिला चला करता है
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २०००-२००१




















Posted by mehhekk on February 5, 2008 at 8:29 PM
kismat ke khel nirale,sundar bhav.