किसी आस्माँ के परे तो

February 5, 2008 at 1:09 am (मेरी नज़्म) (, , , , , , )

किसी आस्माँ के परे तो
तेरी मुहब्बत का हासिल मिलेगा
कितनी तन्हाइयाँ तय करें
कब हमें इनका हासिल मिलेगा

तुम मीलों दूर हो सकती हो
तुम किसी और को चाह सकती हो
मेरा क्या, मैं तुमको चाहूँगा
तेरी उम्मीद में जानम मर जाऊँगा

चाँद ने परदा किया
जब-जब तेरा हुस्न सामने आया
उफ़ वह बे-तस्कीनियाँ
कि चाँद तुझसे हुस्न माँगने आया


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२

Post a Comment