ऐनक उतार के

February 5, 2008 at 12:34 am (फुटकर कलाम) (, , , , , , , , , , , , , , , )

ऐनक उतार के ख़ुद को आइने में
कभी देखा होता
कि इक नूर का टुकड़ा हो
मेरे ख़ाबों में चुभता है जो

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ऐनक उतार के कभी
ख़ुद को आइने में देखा होता
कि इक नूर की बूँद हो
मेरी आँखों में भर आयी है जो

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ऐनक उतार के ख़ुद को कभी
आइने में देखा होता
इक नूर आँखों में उतर जाता
तुझे मालूम हो जाता
कितना हुस्न है तेरे पास

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ऐनक उतार के ख़ुद को कभी
आइने में देखा होता
तो तुम्हें मालूम होता
क्यों आजकल रात में
चाँद फीका रहता है

–x–
ऐनक उतार के ख़ुद को कभी
आइने में देखा होता
तो तुम्हें मालूम होता
हुस्न-निसार हो तुम


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२

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