Archive for February 5th, 2008

मेरी मुहब्बत तो झूठी नहीं

मेरी मुहब्बत तो झूठी नहीं
अगर मैं झूठा हूँ
तुम जो गये हो यहाँ से
पल-पल मैं टूटा हूँ
किसी का एतबार नहीं करता
किसी को देखकर नहीं मरता
एक फ़ितरत-सी बन गयी है
हर पल तुम्हें याद करने की
तुम्हें भूलने की कोशिश में
हर पल तुम्हें क़रीब रखता हूँ
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २०००-२००१

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क़िस्मत की लकीरें

क़िस्मत की लकीरें
मुझे तुझसे दूर रखती हैं
यह नम आँखें
तेरी याद में चाँद तकती हैं
आँखें जब बंद करता हूँ
मैं तेरा चेहरा देखता हूँ
गुलों की तरह
यह साँसों में महकता है
माहताब की तरह
ख़ाबों में दमकता है
भूलता नहीं कुछ भी
सिलसिला चला करता है
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २०००-२००१

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मैं डोली लेने आऊँगा

मैं डोली लेने आऊँगा तुम दुल्हन बनकर रहना
मैं भी रस्ता देखूँगी ओ मेरे दिलबर सजना
प्यार हमारा जनम-जनम का, है ये नाता पुराना
ऐसे प्यार करेंगे दोनों की देखेगा आज ज़माना
हाथों में हाथ ले-ले सोणिए
मैं तेरी हूँ, ओ मेरे राँझणे
प्यार यह दो नज़राँ दाँ हो जाने दे
तेरे वास्ते मुझे सूली चढ़ जाने दे
ऐसी गल्लाँ फिर तुम न [...]

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अब होश नहीं रहता क्या करता हूँ

अब होश नहीं रहता क्या करता हूँ
कभी जीता हूँ तो कभी मरता हूँ
आने वाले ने इतनी देर लगायी है
मैं तो अब इन्हीं राहों पर रहता हूँ
जलाये कोई यार चराग़ इश्क़ के
तो उसे दिल से महसूस करता हूँ
तू बता दे मुझे क्या डर था तुझे
क्यों ख़ुशी में डर महसूस करता हूँ
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २०००-२००१

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काश वह कोई गुल होती

काश वह कोई गुल होती
मैं उसे अपने लबों से चूम लेता
गर वह कोई आइना होती
मैं ख़ुद को उसमें उतार देता
इश्क़ जला है कितनी रातों तक
कोई समझता दर्द मैं बता देता
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २०००-२००१

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