Archive for February 4th, 2008

आज दिन सुलगा होगा

आज दिन सुलगा होगा
रात बरसने दो
दिन कोई बादल होगा
चाँद चमकने दो
आँखों में ख़ाब महके हैं
तुमने छिड़के होंगे ख़ूब-रू
आँखों से मय पिलाने को
तुम बैठे रहो रू-ब-रू
वक़्त की नब्ज़ थाम लो
पिघले न एक क़तरा भी
ख़िज़ाँ के ज़र्द पत्तों का
यह मौसम है उतरा अभी
आज दिन सुलगा होगा
रात बरसने दो
दिन कोई बादल होगा
चाँद चमकने दो
मीठे-मीठे दो यह पल
तुम ज़ुबाँ [...]

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You always got best of me

Flowers knew how to bloom
I always set out myself
From the crowded rooms
I spent all day and night
In your beautiful eyes
To get a new sunrise
Now you’re far faraway
You can’t come to me
N’ I couldn’t get you baby
It’s all haze around me
Only you could solve
All the mathematics involved
I am tried to makeover
Perhaps, it seems possible
Oh, I’m not [...]

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हर रोज़ लकीरें बनती हैं

हर रोज़ लकीरें बनती हैं
हर रोज़ लकीरें मिटती हैं मेरे हाथों से
इक तेरा नाम नहीं मिटता
तेरा चाँद नहीं मिटता है मेरे हाथों से
ख़ाबों की आँधी आती है
ख़ुशबू सौंधी लाती है
तक़दीरों के साये में जो साँसे जीती हैं
वह चाँद की मिसरी से मीठी हैं
आ साँसों को उलझाते हैं
साँसों में उलझ जाते हैं
ऐसे उलझा लो जिस्म कि [...]

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क्यों यह रात अजनबी लग रही है

क्यों यह रात अजनबी लग रही है
क्यों यह चाँद अजनबी लग रहा है
अपना-अपना-सा था कल तक समा
क्यों आज यह बेग़ाना लग रहा है
न कोई अजनबी है न कुछ बेग़ाना है
शायद यह पहले प्यार का एहसास है
जहाँ मैं ख़ुद को अजनबी लग रही हूँ
जहाँ तू ख़ुद को अजनबी लग रहा है
क्यों यह रात अजनबी लग रही [...]

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जाने क्या ढूँढ़ता हूँ बे-दर्द ज़माने में

जाने क्या ढूँढ़ता हूँ बे-दर्द ज़माने में
बड़ा दर्द है अपना किरदार निभाने में
धीरे-धीरे ज़माने के साथ चलते रहे
फासलों को नज़दीकियों में बदलते रहे
समझते थे यह करना हमारी गरज़ है
अब न करें तो इसमें क्या हरज़ है
हर जगह क्या हम ही फर्ज़ निबाहेंगे
और वह ग़ुरूर करके बस इतरायेंगे
वह मान बैठे हैं वह हमसे उम्दा हैं
यह साबित [...]

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