Archive for February 3rd, 2008

अफ़सोस की इक आँधी आयी है

अफ़सोस की इक आँधी आयी है
अफ़सोस का इक जलजला उठा है
तक़दीर के बन्द मर्तबानों में
वक़्त की आग तले
जाने क्या सारी-सारी रात पका है
कभी अपनी कथनी पे अफ़सोस
कभी अपनी करनी पे अफ़सोस
अजब सौदाई है यह दुनिया
कभी-कभी ख़ुद ही यह दिल
चाँद की आग तले जला करता है
अफ़सोस की इक आँधी आयी है
अफ़सोस का इक जलजला उठा है
बड़ी [...]

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मैं दिन-रात कई नींदें सो चुका हूँ

मैं दिन-रात कई नींदें सो चुका हूँ
इस बार जागूँगा तो क़हर बरपेगा
कौन बचेगा इस जहाँ में जब
ज़हरीले बादलों से अम्ल बरसेगा
जिस्म में बहने लगूँगा ज़हर बनके
जिस्म का क़तरा-क़तरा गलने लगेगा
बैठ जाऊँगा तेरे ज़हन में डर बनके
सच-झूठ कुछ न हलक़ से उतेरगा
मैं दिन-रात कई नींदें सो चुका हूँ
इस बार जागूँगा तो क़हर बरपेगा
ख़ला-ख़ला सिर्फ़ देखोगे तुम [...]

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बड़ी मासूम है यह रात

बड़ी मासूम है यह रात
धीरे-धीरे दबे पाँव आयी है
तेरी आँखों जैसी नीली है
गहरे नीले रंग की परछाईं है
आयी तो है मेरे सिरहाने
मगर नींद तो नहीं लायी है
ख़ाब कोई हाथ में नहीं
और क्या मेरे लिए लायी है
चाँद भी नहीं आसमाँ पे
रात और चाँद की जुदाई है
जाने वह कौन हमनशीं है
जिसने आँखों से नींद चुरायी है
शायिर: विनय [...]

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