जब भी नाराज़ होती हो

जब भी नाराज़ होती हो
ख़ुद से उदास रहती हो
ज़रूर इसे इश्क़ कहते होंगे
ख़फ़ा हो तो भी
दिल के पास रहती हो

नासाज़ी दिली लफ़्ज़ों की
निगाहों से बयाँ करती हो
जब अलग जाके
चुपचाप-सी बैठती हो

ख़ामोशी से पढ़ो तो
मेरी आँखों में यह हर्फ़
तैरते नज़र आयेंगे -

सुब्ह की तरो-ताज़ा
सबा तुम
मैंने लबों से चखी जो
वह शबनम तुम

उजली-उजली चाँद वाली
यह रात तुम
शर्करा-सी मीठी-मीठी
हर नयी बात तुम

हसीन चंचल कमसिन
नाज़नीन तुम
परियों-सी ख़ूब-रू
महजबीन तुम

अब तो मुस्कुरा दो
हसीं गुलाबी गालों से
नाराज़गी गिरा दो
आओ बैठो पास मेरे
मेरी नयी तक़दीर का
मुझे कोई सिरा दो


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२

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