मुआफ़ करना तड़पा रहा हूँ
बातें बना रहा हूँ सता रहा हूँ यारा
मैं भी देखता हूँ तुम भी देखती हो
चुप्पी यूँ ही जता रहा हूँ यारा
मुआफ़ करना तड़पा रहा हूँ
बातें बना रहा हूँ सता रहा हूँ यारा
अजब है दो पल की ख़ामोशी
जाने क्या होता है हर बात पे होता है
ढोंग यूँ ही रचा रहा हूँ यारा
मुआफ़ [...]
Archive for February 3rd, 2008
3 Feb
मुआफ़ करना तड़पा रहा हूँ
3 Feb
नूर के जिस्म पर नूर के झुरमुट
नूर के जिस्म पर नूर के झुरमुट
यह पायल कंगन बिंदिया बाली रे
देखकर उसको नींद न आयी रतियाँ जागे
जागे रतियाँ चंदा वाली रे…
ख़ुशबू बसती है उसकी आँखों में
यह शब ढलती जाये बातों में
तफ़सील न हो पाये हर्फ़ों में
लबों पे सुर्ख़ियाँ जैसे गुलाबों में
वह कँवल है जैसे तालाबों में
उसे कोई कैसे लिखे सफ़्हों में
नूर के जिस्म पर [...]
3 Feb
जब भी नाराज़ होती हो
जब भी नाराज़ होती हो
ख़ुद से उदास रहती हो
ज़रूर इसे इश्क़ कहते होंगे
ख़फ़ा हो तो भी
दिल के पास रहती हो
नासाज़ी दिली लफ़्ज़ों की
निगाहों से बयाँ करती हो
जब अलग जाके
चुपचाप-सी बैठती हो
ख़ामोशी से पढ़ो तो
मेरी आँखों में यह हर्फ़
तैरते नज़र आयेंगे -
सुब्ह की तरो-ताज़ा
सबा तुम
मैंने लबों से चखी जो
वह शबनम तुम
उजली-उजली चाँद वाली
यह रात तुम
शर्करा-सी मीठी-मीठी
हर [...]
3 Feb
उठता है वक़्त का धुँआ
उठता है वक़्त का धुँआ
मैं कहाँ वह कहाँ
अजनबी-से मरासिम
आज बे-ख़ाब कहाँ
बीते हुए वक़्त के सफ़्हे
रहे ख़ामोश यह सफ़्हे
वह कहते किससे
रक़ाबी चाँद के किस्से
गहरे हुए रात के शिगाफ़
आने को सहर है
होंठों पे चाँद की मिसरी
मीठा ज़हर है
गाढ़ी-गाढ़ी नीदों में
कोई ख़ाब अटका हुआ है
कोरे सफ़्हे स्याही से
रोज़ चखते हैं हर्फ़ मेरे
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२
3 Feb
जब भी देखता हूँ तेरी तस्वीर
जब भी देखता हूँ तेरी तस्वीर
तो यूँ लगता है कि उस रात
ज़मीं पर चाँद उतर आया था
पहले तो दूर-दूर बैठा रहा
मैं पास गया तो शरमाया भी
वह उसेक बात पे मुस्कुराया था
चेहरे पर हिजाब निगाहों पर हया
लबों पर लफ़्ज़ रुके हुए लेकर
वह कल भी मेरे पास आया था
उसके दामन पे दाग़ बताते थे लोग
मैं वह सारे [...]




















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