तुम जब भी आती हो

तुम जब भी आती हो
साथ में इक नूर लाती हो
नहीं तो आँखों में
इक रात दबाये फिरता हूँ

जलता हूँ मैं शमा पर
परवानों की तरह मचलकर
दोस्तों यारों से अपना
हाले-दिल छुपाये फिरता हूँ

आपकी गुलाबी आँखों की मय
व सुर्ख़ होंठों के तब्बसुम में
अपने आप से बेख़बर
ख़ुद को भुलाये फिरता हूँ

महजबीनों में हसीं बहुत होंगे
पर आप-सा नहीं कोई ख़ूब-रू
तभी तो आशिक़-दिल
आप पर मिटाये फिरता हूँ


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२

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