अजनबी-अजनबी आँखें हैं

अजनबी-अजनबी आँखें हैं
अजनबी-अजनबी चेहरे हैं
कोई शिकन नहीं मुस्कुराहट नहीं
अजनबी जो ठहरे हैं

इक वक़्त था आँखों में
इक वक़्त है आँखों में
कैसे पढ़ते आँखों को
आँखों के रंग जो गहरे हैं

कल भी ख़ामोशियाँ थीं
आज भी ख़ामोशियाँ हैं
तुमने कहा नहीं कुछ भी
लबों पे क्यों यह पहरे हैं

अजनबी-अजनबी आँखें हैं
अजनबी-अजनबी चेहरे हैं
कोई शिकन नहीं मुस्कुराहट नहीं
अजनबी जो ठहरे हैं

आये थे तुम ख़ाब में
आये नहीं तुम ख़ाब में
आज फिर मौसम के
यह सारे रंग दोहरे हैं


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२

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