मैं हूँ चाँद है तुम भी होगी कहीं

February 29, 2008 at 8:49 pm (मेरा गीत) (, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , )

मैं हूँ, चाँद है, तुम भी होगी कहीं
मैं देखता हूँ जो चाँद को…
तुम भी इसे देखती होगी कहीं

माहे-कामिल ने देखा है मुझे
तेरे पाँव के निशाँ पे सजदा करते हुए
सहर उस वक़्त दरक रही थी
सूरज आ रहा था कमसिन किरनें लिए

यह हवा यह घटाएँ
सभी से मैंने कहा था, कहना
मुझे प्यार है तुमसे
जाने तुमने मेरी सदा को
महसूस किया होगा कि नहीं

मैं तन्हा ही तन्हाइयों को दोहराता हूँ
दिल की सदाओं से तुमको बुलाता हूँ
तुम चले आओ सुनकर मेरी सदा
मैं रोज़ ही गीली पलकें सुखाता हूँ

मेरी आँखों ने देखे हैं
कई टूटते हुए सितारे
जिनको तुमने भी देखा होगा
जाने उन्होंने तुमको मेरी
क़िस्मत में लिखा होगा कि नहीं

माहे-कामिल= full moon, पूर्णिमा का चाँद


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १८ मई २००३

Permalink No Comments

प्यार से मुझे प्यार चाहिए

February 29, 2008 at 7:52 pm (मेरा गीत) (, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , )

प्यार से मुझको प्यार चाहिए
गुलाबी लबों से इज़हार चाहिए
उसके हसीं चेहरे पे हँसी चाहिए
उसके लिए हर ख़ुशी चाहिए

उसने मुझको दीवाना बनाया है
मेरी आँखों को आशिक़ाना बनाया है
अब हर शै में वही दिखती है
आँखों में उसका ख़ाब चाहिए
मुझको मेरा माहताब चाहिए

प्यार से मुझको प्यार चाहिए
गुलाबी लबों से इज़हार चाहिए

मेरी धड़कनों में वह धड़कती है
उसके बिना सीने में जान तड़पती है
मुझको उसे अपना बनाना है
मुझको वही एक यार चाहिए
दिल में उसका ख़ुमार चाहिए

उसके हसीं चेहरे पे हँसी चाहिए
उसके लिए हर ख़ुशी चाहिए


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १८ मई २००३

Permalink 2 Comments

मुझको यूँ प्यार कैसे हो गया

February 28, 2008 at 10:46 pm (मेरा गीत) (, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , )

मुझको यूँ प्यार कैसे हो गया
उफ़! यह दिल सौदाई हो गया
मुझको कुछ पता ही न चला
इक दम में यह सब हो गया

रोज़ तेरे ख़्यालों में डूबा रहा
शब तेरे ख़ाब में मैं खो गया
जिस शै पर मैंने निगाह की
वह हर शै तेरा चेहरा हो गया

दर्द की तस्कीं थोड़ी अजीब है
तू मुदाम मेरे दिल के क़रीब है
उसपे ये जुनूँ भी मेरा हरीफ़ है
बुत की अदा पे दिल आ गया

मुझको यूँ प्यार कैसे हो गया
उफ़! यह दिल सौदाई हो गया

ख़ुद से बयानबाज़ी करते रहे
हम तो यारों ख़ुद से लड़ते रहे
दिल पे ज़रा भी ज़ोर न चला
बराबर उसके आस्ताँ को गया

मुझको यूँ प्यार कैसे हो गया
उफ़! यह दिल सौदाई हो गया
मुझको कुछ पता ही न चला
इक दम में यह सब हो गया


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १३ मई २००३

Permalink No Comments

क्यों हो गया न प्यार…!

February 28, 2008 at 7:18 pm (मेरा गीत) (, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , )

यह प्यार चीज़ क्या है?
दीवानों का है काम
बेकार ही पीछे दौड़ते हैं
बिन सोचे अन्जाम

कहते थे कि प्यार हमको होगा नहीं
क्यों हो गया न प्यार…!

बहुत तन के चलते थे
जब घर से निकलते थे
प्यार में क्या रखा है
बस एक ही बात रटते थे

आज मुँह पर उल्टी आ पड़ी हर बात
क्यों हो गया न प्यार…!

आज क्या हुआ
वह नाक पे बैठा हुआ गुस्सा
चलो लाओ दो हमें
प्यार में हमको हमारा हिस्सा

अजी नज़र चुराकर कहाँ चल दिए
क्यों हो गया न प्यार…!

प्यार ख़ूबसूरत है
यह दिल की ज़रूरत है
दुनिया में बस यही
ख़ुदा की एक इनायत है

आज तुमको हो गया हमपे एतबार
क्यों हो गया न प्यार…!


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: १० मई २००३

Permalink No Comments

तेरी जो ख़ाहिश करता हूँ

February 28, 2008 at 6:06 pm (मेरा गीत) (, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , )

तेरी जो ख़ाहिश करता हूँ
क्या कोई गुनाह करता हूँ
चाहे जो भी समझ ले तू
मैं तुझसे प्यार करता हूँ

यह उम्र ही ऐसी होती है
लोग कुछ बहक जाते हैं
मिलते हैं जब दो दिल
तन्हा जिस्म महक जाते हैं

महके-महके-से जिस्म में
मैं आधा-आधा रहता हूँ
चाहे जो भी समझ ले तू
मैं तुझसे प्यार करता हूँ

पलकें मूँदके मैं लेट गया
तू ही आँखों में रहती है
यह कैसी कशिश है तुझमें
जो मुझको खीचती रहती है

जिस पल से देखा है तुझे
तुझपर ही आहें भरता हूँ
चाहे जो भी समझ ले तू
मैं तुझसे प्यार करता हूँ

तेरी जो ख़ाहिश करता हूँ
क्या कोई गुनाह करता हूँ
चाहे जो भी समझ ले तू
मैं तुझसे प्यार करता हूँ


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: ०९ मई २००३

Permalink No Comments

« Previous entries