अब तो लौट आ
सुन ले दिल की सदा
अब तो लौट आ
सुन ले दिल की ज़रा
मेघा भी छाये हैं
आब यह बरसाये हैं
तू रेगिस्तानों की
मरीचिका बनकर
क्यों मुझे सताये है
परछाइयों को
आइनों में रख दे
आइने से बाहर आ
अब तो लौट आ
सुन ले दिल की वफ़ा
अब तो लौट आ
सुन ले दिल की रज़ा
वादियों में हरियालियाँ हैं
दिलों में ख़ुशहालियाँ हैं
मुझको क्यों रिझाती
तेरे कानों की
दोनों बालियाँ यह
खा़बों को
माज़ी में छोड़ दे
माज़ी के बाहर आ
अब तो लौट आ
अब तो लौट आ
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२
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किसी जाने से क्या बदल जाता है
बस दिल बदल जाता है
अपना दिल बदल जाता है
छत पर खड़े होते थे
बहती पुरवाई में तेरी ख़ुशबू होती थी
आज भी बहती है वह
लेकिन उदास बातें करती है वह…
किसी के जाने से क्या बदल जाता है
अपना दिल बदल जाता है
आइने में जैसे देखते थे ख़ुद को
वह नज़रिया बदल जाता है…
बेलों पर वह गुच्छे,
कुछ सफेद कुछ गुलाबी
आज भी खिला करते हैं
हम कब ख़ुद से
तेरा कोई गिला करते हैं
ज़ख़्म सिला करते हैं…
वह सूरज जो किसी के साथ ढलता था
आज अकेले ही ढल जाता है
किसी के जाने से क्या बदल जाता है
अपना दिल बदल जाता है…
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२
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जाने कहाँ खो गयी तू
दूर मुझसे हो गयी तू
ढूँढ़ रहा हूँ…
दीवानों की तरह मैं तुझको
सोच ज़रा क्या मेरा हाल है
क्या तेरा भी होगा ऐसा ही
मेरे जैसा ही…
जाने कहाँ खो गयी तू
दूर मुझसे हो गयी तू
पागल हुआ…
मेरा अफ़साना बना
मैं तेरा परवाना बना
इश्क़ में जला दे मुझे
गले से लगा ले मुझे
कर दे कुछ ऐसा ही…
जाने कहाँ खो गयी तू
दूर मुझसे खो गयी तू
दिल में इक तस्वीर है
तेरी है
मेरी जो तक़दीर है
तू ही है
सोचा था जैसा पाया था मैंने
तुझको वैसा ही…
जाने कहाँ खो गयी तू
दूर मुझसे हो गयी तू
अब तो लौट आ…
अब तो लौट आ…
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२
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रात का सिरा जाने कहाँ गिरा
हमने तो चाँद जलाया है
हमने तो चाँद जलाया है
रात गुज़री नहीं दिन आया नहीं
हमने तो ख़ाब सजाया है
हमने तो ख़ाब सजाया है
जब भी टूटा कोई सितारा
हमने तुम्हें ही माँगा है
दिल के झरोखों में आज भी
तेरी मोहब्बत का साया है
रात का सिरा, जाने कहाँ गिरा
हमने तो चाँद जलाया है
और हम ढूँढ़ते क्या जब
चेहरा तेरा नज़र आया है
ख़ाली था दिल का आशियाँ
दिल में तुमको बसाया है
रात गुज़री नहीं दिन आया नहीं
हमने तो ख़ाब सजाया है
रात का सिरा जाने कहाँ गिरा
हमने तो चाँद जलाया है
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२
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क्या मुझको तुमसे प्यार है
जो तुम ख़ाब में आने लगे
नहीं-नहीं-
ऐसा तो कभी मैंने चाहा नहीं
जो तुम इतना मुझे तड़पाने लगे
मुझको एक डर था दिल में एक शक़ था
मैं कहीं खो न जाऊँ तेरी
इन नशीली आँखों में
एक मौसम भी आया हुआ है शाखों पर…
मैं कहीं बेल बनकर लिपट न जाऊँ
इन रसीली शाख़ों से
नहीं-नहीं-
ऐसा तो कभी मैंने चाहा नहीं
जो तुम इतना मुझे उलझाने लगे
ख़ाब में जो तेरा हाथ थाम लिया था मैंने
उसका वह अजब एहसास
अब तक दिल से गया नहीं
बहुत थम-थम के गुज़रा वह लम्हा
मैंने चाहा तो बहुत मगर
वह पल, पल में ख़त्म हुआ नहीं
क्या मुझको तुमसे प्यार है
जो तुम ख़ाब में आने लगे
नहीं-नहीं-
ऐसा मैंने कभी चाहा नहीं
जो तुम इतना मुझे लुभाने लगे
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२
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still faces
some unforgettable traces
make your mind
go back to you
see, what…
you had tried to find
sound nights
hard dreams
feeling dry winds
still faces
emotionless
no meaning in eyes
wherefore, they dry
still faces
expressionless
stupid things in eyes
wherefore, they cry
past had a long past
drive your life
faster than fast
try to get
what you had to loose
because
there’s no more heart to bruise
kick your drugs
and fit your arms with her
to live a long life
there’s no more need to add cipher
still face
some unforgettable traces
make your mind
emotionless, expressionless
words: vinay prajapati
penned: 2002
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एक अजीब-सी कशिश है तुझमें
एक अजब-सा नशा है
कई बार बहाने से
तुझे बहुत क़रीब से देखा है
कभी फूलों को खिलते हुए
कभी तितलियों को मचलते हुए
और तुझे वजहसार होके
हँसते हुए देखा है
एक अजीब-सी कशिश है तुझमें
एक अजब-सा नशा है
तेरी हँसी किसी अरुसि से कम नहीं
तेरी आँखों का नशेमन
किसी ख़ुशी से कम नहीं
जब देखा है, तुझे देखा है
एक अजीब-सी कशिश है तुझमें
एक अजब-सा नशा है
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२
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