आ तेरी आँखों के नीलम से

January 10, 2008 at 12:00 am (मेरा गीत) (, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , )

आ तेरी आँखों के नीलम से
यह चाँद-रात नीली कर दूँ
पलकों पे रख लूँ कुछ ख़ाब तेरे
अपने कर लूँ…

खोने लगें तो खोने देना
डूब जाना मुझको डबोना
बोझल-बोझल शाम है
मत पूछना क्या नाम है

आ तेरी आँखों के नीलम से
यह चाँद-रात नीली कर दूँ

बढ़ने दे रात की ख़ाहिश
होने दे ख़ाब की बारिश
उलझने दे जितना उलझते जायें
ऐसा उलझें कि सुलझ न पायें

आ तेरी आँखों के नीलम से
यह चाँद-रात नीली कर दूँ


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००१-२००२

2 Comments

  1. brijesh said,

    February 23, 2008 at 5:21 pm

    bahot hi achhi hai

  2. विनय प्रजापति said,

    February 24, 2008 at 3:22 am

    धन्यवाद ब्रिजेश जी कि आपने गीत पढ़ने का समय निकाला और अपनी प्रतिक्रिया दी।

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