आ तेरी आँखों के नीलम से
आ तेरी आँखों के नीलम से
यह चाँद-रात नीली कर दूँ
पलकों पे रख लूँ कुछ ख़ाब तेरे
अपने कर लूँ…
खोने लगें तो खोने देना
डूब जाना मुझको डबोना
बोझल-बोझल शाम है
मत पूछना क्या नाम है
आ तेरी आँखों के नीलम से
यह चाँद-रात नीली कर दूँ
बढ़ने दे रात की ख़ाहिश
होने दे ख़ाब की बारिश
उलझने दे जितना उलझते जायें
ऐसा उलझें कि सुलझ न पायें
आ तेरी आँखों के नीलम से
यह चाँद-रात नीली कर दूँ
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००१-२००२
brijesh said,
February 23, 2008 at 5:21 pm
bahot hi achhi hai
विनय प्रजापति said,
February 24, 2008 at 3:22 am
धन्यवाद ब्रिजेश जी कि आपने गीत पढ़ने का समय निकाला और अपनी प्रतिक्रिया दी।