बहते थे जो कल

January 31, 2008 at 6:43 am (मेरा गीत)

बहते थे जो कल
आज वह पल ठहरे हैं
हम कल भी तेरे थे
हम आज भी तेरे हैं

ज़िन्दगी से शिकवा नहीं
मौत ने मोहलत दी है
तेरी इक झलक थी
जिसके लिए क़िस्मत बदली है

कल भी होश नहीं था
आज भी होश नहीं है
मगर तेरा चेहरा
पलकों में आज भी है

तुम ख़ुदा की इबादत हो
तुम उसकी इनायत हो
जो लिखी गयी शिद्दत से
तुम वह आयत हो

नज़र ढूँढ़ती थी
यह दिल बेज़ुबाँ था
हमने कहा नहीं
मगर तुमने सुना था

कल भी लड़खड़ाते थे पाँव
आज भी लड़खड़ाते हैं
पहले भी बेज़ार नज़र आते थे
अब भी नज़र आते हैं


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२

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चाँद हसीं हो तो रात हसीं होती है

January 31, 2008 at 1:22 am (मेरा गीत)

चाँद हसीं हो तो रात हसीं होती है
नब्ज़ चले तो साँस फँसी होती है
कोई वादा कोई इरादा करके आना होता है
जिस्म से जान का फ़साना होता है

मैंने एक बार एक चाँद माँगा था रब से
अब उस चाँद से दूर रहना होता है
आज तो अँधेरे चलते है पलकों के तले
उजालों का कहीं और झिलमिलाना होता है

सुना है वफ़ा, वफ़ा का जाम होती है
वफ़ा इश्क़ का दूसरा नाम होती है
सबसे कहाँ यह हसीन गुनाह होता है
जिससे हो जाये वह इश्क़ के पनाह होता है



शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२

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कोई बुला रहा है

January 31, 2008 at 12:24 am (मेरा गीत)

कोई बुला रहा है,
हमको जाना होगा
उसकी दो आँखों में,
मेरा आशियाना होगा

पलकों पे दो ख़ाब होंगे
एक उसका होगा
एक मेरा होगा
जब दोनों मिलेंगे
चाँद जलता होगा
सौंधा-सौंधा सवेरा होगा

बैठेंगे जब
उन चट्टानों पर
जिन पर
लहरें आती होंगी
ढलती हुई शामें होंगी
और मेरे काँधे पे
सिर उसका होगा…

हल्के-हल्के
नर्म-नर्म
ख़ाब रोज़ देखेंगे
जब मेरे हाथों में
हाथ उसका होगा…

कोई बुला रहा है
हमको जाना होगा…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२

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जाने क्या है माज़ी में

January 31, 2008 at 12:08 am (मेरा गीत)

जाने क्या है माज़ी में
जो धड़कता है,
कोई इन गलियों में
अकेला भटकता है…

मोहब्बत क्या है
पतझड़ या बहार है
बदला नहीं जो सदियों में
वह प्यार है…

कुछ मरासिम हम
आज भी निभाते हैं
सदा तस्व्वुर में
तेरा चेहरा पाते हैं…

जाने क्या है माज़ी में
जो धड़कता है,
कोई इन गलियों में
अकेला भटकता है…

रहते थे जहाँ वह
आज उस आशियाँ पे
बेलों का डेरा है,
कहते थे यह तुम
यह जो तेरा दिल है
वह मेरा है…

जाने वाले क्या
छोड़ के जाते हैं
चाहने वालों के
दिल तोड़ जाते हैं,

आँखों में फिर
तेरे ख़ाब जलते हैं,
नींद में उठकर,
आज भी चलते हैं…

जाने क्या है माज़ी में
जो धड़कता है,
कोई इन गलियों में
अकेला भटकता है…


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२

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तेरे हाथों में वह कंगन

January 30, 2008 at 11:39 pm (मेरा गीत)

तेरे हाथों में वह कंगन
आज जचते भी होंगे ना
खन-खन करते भी होंगे ना

तेरे माथे की वह बिंदिया
झिलमिलाती भी होगी ना
सितारे बुझाती भी होगी ना

आइना तुझको देखकर
फ़िदा होता भी होगा ना
सब वैसा ही होगा ना

तेरे आँगन की तितलियाँ
तू उड़ाती भी होगी ना
उसी तरह मुस्कुराती होगी ना

मेंहदी लगाकर सखियाँ
पिया की बातें करती होंगी
तुझे चिढ़ाती भी होगी ना

और फिर तू उनको
सपने सुनाती भी होगी ना
मुझे याद करती तो होगी ना


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००२

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