तू संग न होगा

तू कर यह वादा भी मेरे अल्लाह तू संग न होगा
तू है भी अगर किसी बुते-संग में तू संग न होगा

तेरी मर्ज़ी से यह गुलशन वीरानो-गुल्ज़ार हैं
मैं दुआ करूँगा दमे-आख़िर तक तू संग न होगा

मेरी क़िस्मत में क्या बदा है एक तू ही जानता है
गर हुआ कभी मेरी दुआ का हश्र तू संग न होगा

जुज़ मेरे हर मुक़ाम पर इक मुक़ीम दिखता  है
मैं तन्हा खड़ा हूँ कब से राह में तू संग न होगा

मत कर फ़िक्र मेरे ‘वफ़ा’ यह तेरा अंजाम नहीं
दिल दुखते-दुखते भी कहता रहा तू संग न होगा

इस ग़ज़ल में संग एक उर्दू अल्फ़ाज़ है जिसका अर्थ पत्थर होता है|


शायिर: विनय प्रजापति ‘वफ़ा’
लेखन वर्ष: २००३

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