मुलाक़ात ज़रूरी तो नहीं इख़लास जताने के लिए

December 28, 2007 at 2:00 pm (मेरी ग़ज़ल) (, , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , , )

मुलाक़ात ज़रूरी तो नहीं इख़लास जताने के लिए
तेरी यादें बहुत है यह उम्र बिताने के लिए

तेरे रंग की हर फ़ज़िरो-शाम से इख़लास है मुझे
चाहिए इन्हें भी तो एक उज़्र सताने के लिए

एक चाँद जानता है मेरी तन्हाई का सारा सबब
पर उसको नहीं ज़ुबाँ यह सब बताने के लिए

दिल की पगडंडियों से रोज़ाना कितने ही गुज़रते हैं
तुम आये थे बिन बताये लौटकर जाने के लिए

कोस के अपनी क़िस्मत को वह दोष नहीं देता है
है ‘नज़र’ दीवाना सिर्फ़ तुम्हीं को पाने के लिए

इख़लास= love, favour, frienship; फ़ज़िरो-शाम= morning and evening;
उज़्र= reason, festival; सबब= cause


शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३

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