हम भी पागल थे ग़ैरों को अपना जानते थे

हम भी पागल थे ग़ैरों को अपना जानते थे
रुसवा किये जायेंगे इस क़दर यह न जानते थे

बेवफ़ा गर वह होता दर्द शायद कम होता
उसकी वफ़ा का भेद यूँ खुलेगा यह न जानते थे

एक-एक साँस से दबके हूक पत्थर हो गयी
संगे-शरर से जल जायेंगे यह न जानते थे

हमें ज़ब्रो-ज़ोर से किसने ठगा सरे-राह
दोस्ती करके ठगे जायेंगे यह न जानते थे

देख तो ‘वफ़ा’ अपने ख़ाली वीरान दिल में
दाग़ वही सुलगता है जिसको अपना जानते थे


शायिर: विनय प्रजापति ‘वफ़ा’
लेखन वर्ष: २००३

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  1. Posted by Ashok Duhan Petwer 09896470222 on September 10, 2009 at 3:55 PM

    हम भी पागल थे ग़ैरों को अपना जानते थे
    रुसवा किये जायेंगे इस क़दर यह न जानते थे
    Ashok Duhan Petwer HARYANA MOB-09896470222

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